स्काउट बेसेट: एक बच्ची, जिसने बेल्ट और टेप से अपना पैर बनाया और पैरालंपिक ट्रैक तक दौड़ी

“हार मत मानो” कहना आसान है, पर इसे जीकर दिखाना बहुत कम लोगों को आता है। अमेरिकी पैरालंपिक धावक स्काउट बेसेट उन्हीं में से एक हैं। चीन के एक अनाथालय में पली एक बच्ची, जिसके पास चलने के लिए अपना कृत्रिम पैर तक नहीं था, आज विश्व रिकॉर्ड धारक एथलीट, लेखिका और खिलाड़ियों के लिए फ़ंड चलाने वाली संस्थापक है। इस साल उनकी कहानी फिर चर्चा में है। यह लेख 29 अक्टूबर 2026 तक की सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है।

शुरुआत: एक सड़क और एक अनाथालय

अमेरिकी पैरालंपिक समिति की प्रोफ़ाइल के मुताबिक स्काउट नानजिंग (चीन) के एक सरकारी अनाथालय में पली-बढ़ीं। उन्हें शिशु अवस्था में एक गली में पाया गया था और उनका दाहिना पैर एक रासायनिक आग में चला गया था। उसी स्रोत का एक और ब्योरा चौंकाने वाला है: छह साल की उम्र में उन्होंने चमड़े की बेल्ट और मास्किंग टेप से अपना कृत्रिम पैर बनाया और चलना सीखा।

सोचिए, जिस उम्र में बच्चे साइकिल चलाना सीखते हैं, उस उम्र में वह अपने लिए चलने का साधन ख़ुद जुटा रही थी। यहीं से उस जीवट का अंदाज़ा मिलता है जो बाद में उनकी पहचान बना।

अमेरिका की नई ज़िंदगी, पर नई मुश्किलें

सात साल की उम्र में उन्हें अमेरिकी माता-पिता ने गोद लिया और वे मिशिगन के हार्बर स्प्रिंग्स में बस गईं। यहाँ भी राह आसान नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार वे अपने स्कूल की इकलौती एशियाई छात्रा थीं, अंग्रेज़ी सीख रही थीं, और उन्हें अलग-थलग किया गया और बुरा बर्ताव झेलना पड़ा। जवाब में उन्होंने खेलों का रास्ता चुना। उसी रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने बास्केटबॉल से लेकर टेनिस तक कई खेल आज़माए।

फ़रवरी 2026 में क़तर फ़ाउंडेशन के एजुकेशन सिटी स्पीकर सीरीज़ में उन्होंने इस दर्द को खुलकर बयान किया। क़तर लिविंग की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कहा कि बचपन में वे ज़्यादातर खेलों से बाहर रखी गईं, जिसका उनके आत्मसम्मान पर गहरा असर पड़ा और उन्हें लगता रहा कि वे कहीं की नहीं हैं। फिर भी उन्होंने खेल को ही अपना सहारा बनाया। उसी कार्यक्रम में उनका कहना था कि खेल ने उन्हें मूल्य, उद्देश्य और अर्थ दिया।

ट्रैक पर पहचान

मोड़ तब आया जब वे चैलेंज्ड एथलीट्स फ़ाउंडेशन से जुड़ीं। यूएसओपीएम की रिपोर्ट के अनुसार इसी संस्था के ज़रिए उन्हें ट्रैक एंड फ़ील्ड का शौक़ मिला। उन्होंने जी-तोड़ अभ्यास किया और 2016 में रियो में पैरालंपिक की शुरुआत की। स्पीकर प्रोफ़ाइल के मुताबिक उन्होंने 2016 में अमेरिकी पैरालंपिक टीम के लिए क्वालीफ़ाई किया और 100 मीटर में पाँचवें स्थान पर रहीं। इसके बाद वे तीन वैश्विक पदक जीत चुकी हैं। 2019 में उन्होंने लीमा पैराअमेरिकन खेलों में स्वर्ण पदक जीता।

उनकी उपलब्धियों की झलक म्यूज़ बाय क्लियो की रिपोर्ट में मिलती है: वे 100 मीटर की सात बार की राष्ट्रीय चैंपियन हैं, 400 मीटर की विश्व रिकॉर्ड धारक हैं और 200 मीटर की अमेरिकी रिकॉर्ड धारक हैं। इससे पहले उन्होंने आईटीयू पैराट्रायथलॉन विश्व चैंपियनशिप में तीन रजत और एक कांस्य पदक भी जीते थे।

2026 की ताज़ा ख़बरें: दौड़ से आगे की दौड़

स्काउट सिर्फ़ ट्रैक की कहानी नहीं हैं। इस साल उनके नाम पर कई घटनाएँ हुईं।

स्काउट बेसेट फ़ंड

सबसे अहम पहल है उनका फ़ंड, जो विकलांग महिला एथलीटों को आर्थिक मदद देता है। याहू क्रिएटर्स में जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह फ़ंड 2023 में इसलिए शुरू किया क्योंकि अपने सफ़र में उन्होंने देखा था कि उनके जैसे एथलीटों के लिए आर्थिक सहारा कितना कम है। उसी रिपोर्ट में वे कहती हैं कि एलए28 क़रीब आने के साथ यह काम और तेज़ हो रहा है।

फ़ंड कैसे काम करता है, यह म्यूज़ की रिपोर्ट में दर्ज है: वुमेन्स स्पोर्ट्स फ़ाउंडेशन और एथलीट्स फ़ॉर इम्पैक्ट के साथ बने स्काउट बेसेट ग्रांट के ज़रिए विकलांग महिला एथलीटों को शीर्ष स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए धन मिलता है। 2026 में यह ग्रांट अमेरिकी पैरालंपियन बिएट्रिज़ हैट्ज़ को भी मिला। इसी सिलसिले में उभरती पैरालंपिक एथलीट एनी केरी का नाम सामने आया। याहू की रिपोर्ट में उन्हें इस निवेश का जीता-जागता नतीजा बताया गया है।

वुमेन्स स्पोर्ट्स फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष

सितंबर 2026 की स्पोर्ट्स बिज़नेस रेडियो की रिपोर्ट के अनुसार स्काउट अब वुमेन्स स्पोर्ट्स फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष हैं और समानता, विकलांगता समावेश और कम प्रतिनिधित्व वाले एथलीटों की पहुँच के लिए काम करती हैं। यानी वे अब सिर्फ़ मैदान की नहीं, खेल-नीति और संसाधनों की लड़ाई की भी चेहरा हैं।

सम्मान

  • यूसीएलए का सम्मान: उसी रिपोर्ट में बताया गया कि उन्हें यूसीएलए का 2025 का “यंग एलमनस ऑफ़ द ईयर” चुना गया, जो हाल के स्नातकों के लिए विश्वविद्यालय के सबसे बड़े सम्मानों में है।
  • क्लियो पुरस्कार: म्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में खेल जगत में उनकी पैरवी के लिए उन्हें क्लियो स्पोर्ट्स इम्पैक्ट अवॉर्ड मिला।
  • किताब: उनकी आत्मकथा का नाम “लकी गर्ल” है। रिपोर्ट के अनुसार इसमें शुरुआती आघात से उबरने और अपनी ताक़त तक पहुँचने की कहानी दर्ज है।

उनकी कही चार बातें, जो हर किसी के काम की हैं

1. “पैरालंपिक कम प्रतिस्पर्धी हैं”, यह ग़लतफ़हमी है

म्यूज़ की बातचीत में जब उनसे पूछा गया कि विकलांग एथलीटों के बारे में लोग सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी क्या पालते हैं, तो उनका जवाब था कि लोग उन्हें सिर्फ़ “भागीदारी” वाले एथलीट मान लेते हैं और सोचते हैं कि पैरालंपिक में इतनी होड़ नहीं होती या प्रशिक्षण उतना कड़ा नहीं होता। यह बात हमारे देश पर भी लागू होती है, जहाँ पैरा-खिलाड़ियों की मेहनत अक्सर पदक आने तक अनदेखी रह जाती है।

2. समावेश को दान न समझें

क़तर के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि विकलांग लोगों का साथ देना “चैरिटी के काम जैसा” माना जाता है, और इस धारणा को तोड़ना ज़रूरी है। इसी बातचीत में उन्होंने एक कड़वा अनुभव साझा किया: पढ़ाई के बाद उन्हें इंटरव्यू के बुलावे तभी मिले जब उन्होंने अपनी विकलांगता छिपाई। यह रोज़गार में भेदभाव की सीधी मिसाल है।

3. पैसे का बोझ असली दीवार है

याहू की रिपोर्ट में लिखा है कि स्काउट जानती हैं कि पैरालंपियन बनने की क़ीमत पदकों या जिम के घंटों में नहीं, डॉलरों में चुकानी पड़ती है। भारत में भी कृत्रिम अंग, कोच और यात्रा का ख़र्च कई प्रतिभाओं को रोक देता है।

4. सलाह हमेशा मानने लायक़ नहीं होती

उसी रिपोर्ट के अनुसार उन्हें सालों तक सुनना पड़ा कि पैरालंपिक खेलों की किसी को परवाह नहीं और इन्हें कोई नहीं देखेगा। उन्होंने अपना करियर और अब अपना फ़ंड बनाकर इसे ग़लत साबित किया।

“#StayStrong” का असली मतलब

स्काउट के नाम से जुड़ी #StayStrong श्रृंखला ओलंपिक चैनल के पॉडकास्ट में आई थी। तब कोरोना लॉकडाउन था और अपने अपार्टमेंट से बात करते हुए उन्होंने संकट का सामना करने के कुछ सुझाव दिए। उस दौर की बातें आज भी काम की हैं, क्योंकि “मज़बूत बने रहो” का मतलब हर रोज़ की छोटी-छोटी लड़ाइयों में टिके रहना है। स्काउट की कहानी से इसके तीन व्यावहारिक सबक निकलते हैं:

  1. अपना साधन ख़ुद जुटाओ। बेल्ट-टेप का पैर इसी का उदाहरण है, जब कुछ न हो तो जो है उसी से शुरुआत करो।
  2. जगह माँगो, और न मिले तो बनाओ। खेलों से बाहर रखी गई बच्ची ने बाद में दूसरों के लिए फ़ंड बनाया।
  3. सफलता को बाँटो। उनके लिए जीत का मतलब सिर्फ़ ख़िताब नहीं, दूसरों के लिए रास्ता खोलना भी है।

भारतीय पाठकों के लिए क्या सीख?

भारत में पैरा-खेलों की चर्चा पिछले कुछ सालों में बढ़ी है, पर आर्थिक मदद, सुलभ मैदान और नौकरियों में बराबरी की लड़ाई अब भी जारी है। स्काउट की कहानी हमें तीन बातें याद दिलाती है:

  • पदक आने से पहले खिलाड़ी की मदद ज़्यादा काम की होती है।
  • विकलांगता को सहानुभूति से नहीं, बराबरी की नज़र से देखा जाए।
  • मीडिया पैरा-खेलों को सिर्फ़ जीत के बाद नहीं, तैयारी के दौरान भी जगह दे।

निष्कर्ष

स्काउट बेसेट की कहानी एक पंक्ति में समेटी जा सकती है: जिसे कभी कहीं जगह नहीं मिली, उसने ख़ुद जगह बनाई और फिर दूसरों के लिए दरवाज़ा खोल दिया। एलए28 पास आ रहा है, और उनका फ़ंड, उनकी अध्यक्षता और उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ी की महिला पैरा-एथलीटों के लिए कितना बड़ा सहारा बनेंगे, यह आने वाले सालों के नतीजे बताएँगे। फ़िलहाल इतना तय है कि “स्टे स्ट्रॉन्ग” उनके लिए नारा नहीं, जीने का तरीक़ा है।

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